Treatment Facility Provided At Prakash Aturalayam
OsteoArthrities
एक डिजेनेरेटिव जॉइंट डिजीज है। यह तब होता है जब जोड़ों (joints) की सतह पर मौजूद कार्टिलेज धीरे-धीरे घिसने लगता है। कार्टिलेज एक चिकनी परत होती है जो हड्डियों को रगड़ने से बचाती है। इसके नुकसान से हड्डियाँ आपस में रगड़ने लगती हैं और दर्द, जकड़न (stiffness) और सूजन हो सकती है।
Varicose veins
यह सूजी हुई, बढ़ी हुई और मुड़ी हुई नसें होती हैं, जो आमतौर पर नीली या बैंगनी होती हैं, जो त्वचा के ठीक नीचे दिखाई देती हैं, ज्यादातर पैरों में, क्षतिग्रस्त वाल्वों के कारण जो हृदय में उचित रक्त प्रवाह को रोकते हैं।
Leucoderma
श्वित्र (Leucoderma) एक त्वक विकार है जिसमें त्वचा का रंग उड़कर सफेद धब्बे बन जाते हैं। यह मुख्यतः पित्त दोष विकृति से होता है।
Auto-Immune Disease
जब शरीर की रोग प्रतिरोधक शक्ति (Ojas / Vyadhikshamatva) स्वयं के ऊतकों पर आक्रमण करती है, तब उत्पन्न होने वाले रोगों को ऑटोइम्यून रोग कहते हैं।
Kidney Disease
किडनी रोग वह स्थिति है जिसमें मूत्रवह स्रोतस का कार्य बिगड़ जाता है, जिससे मूत्र निर्माण में कमी, शरीर में अपशिष्ट का जमाव, सूजन, थकान व उच्च रक्तचाप जैसे लक्षण दिखाई देते हैं।
Psoriasis
सोरायसिस एक क्रॉनिक, ऑटोइम्यून, गैर-संक्रामक त्वचा रोग है जिसमें त्वचा पर लाल, खुजलीदार, परतदार चकत्ते (Plaques) बनते हैं।
Neurological Disease
यह मस्तिष्क, रीढ़ की हड्डी और नसों को प्रभावित करते हैं और शरीर की संवेदनाएँ, गतिशीलता व मानसिक क्रियाओं को बाधित करते हैं। आयुर्वेद में इन रोगों को मुख्यतः वातव्याधि कहा गया है
Gastrointestinal
Disorders
यह पाचन तंत्र (आमाशय, आंत, यकृत, पित्ताशय, अग्न्याशय) को प्रभावित करते हैं। इन रोगों में मुख्य समस्या अग्निमांद्य (कमज़ोर पाचन शक्ति) और दोष असंतुलन होती है, जिससे शरीर में अम (विषैले पदार्थ) बनते हैं। आयुर्वेद में इन्हें अन्नवाह स्रोतस व पुरीषवाह स्रोतस विकार माना गया है।
Urinary Tract Infection
मूत्र मार्ग संक्रमण (UTI) वह स्थिति है जिसमें मूत्र मार्ग (गुर्दे, मूत्रवाहिनी, मूत्राशय या मूत्रमार्ग) में बैक्टीरियल संक्रमण हो जाता है। यह महिलाओं में अधिक सामान्य है। आयुर्वेद में इसे मुख्यतः “Mutrakricchra” (मूत्रकृच्छ्र) कहा गया है।
Piles & Fistula
गुदा मार्ग में स्थित रक्तवाहिनियों के फूल जाने से गुदा के अंदर या बाहर गांठ जैसी संरचना बन जाती है। इसे “बवासीर” कहा गया है। गुदा मार्ग और बाहरी त्वचा के बीच बनने वाला असामान्य मार्ग। इसे “भगन्दर” कहा गया है।
Swarna Prashana
स्वर्ण प्राशन (Swarna Prashana) बच्चों के लिए आयुर्वेद की एक विशेष प्रतिरक्षा वर्धक (Immuno-Boosting) और बुद्धिवर्धक (Memory-Enhancing) परंपरा है।
Infertility
Infertility यानी संतान प्राप्ति में असमर्थता। यदि कोई दंपति 1 वर्ष तक नियमित यौन संबंध बनाने के बावजूद गर्भधारण नहीं कर पाता है, तो इसे Infertility कहा जाता है। आयुर्वेद में इसे “वन्ध्यत्व” (Vandhyatva) कहा गया है।
PCOD/PCOS
महिलाओं में पाई जाने वाली एक सामान्य हार्मोनल असंतुलन की समस्या है। इसमें अंडाशयों (Ovaries) में कई छोटे-छोटे सिस्ट बन जाते हैं और मासिक धर्म चक्र (Menstrual Cycle) अनियमित हो जाता है। यह प्रजनन क्षमता, वजन और मेटाबॉलिज्म को प्रभावित कर सकता है।
Joint Pain
जोड़ों का दर्द (Joint Pain / संधि शूल) एक सामान्य समस्या है जिसमें शरीर के किसी भी जोड़ में दर्द, अकड़न या सूजन हो सकती है। यह अस्थायी (Acute) या दीर्घकालिक (Chronic) हो सकता है और व्यक्ति की चलने-फिरने की क्षमता को प्रभावित करता है।
Heart Disease
हृदय रोग (Heart Disease) हृदय की संरचना या कार्य में गड़बड़ी से उत्पन्न विकारों का समूह है, जिसमें रक्त का प्रवाह बाधित हो जाता है और पूरे शरीर में ऑक्सीजन की आपूर्ति प्रभावित होती है। यह कोरोनरी आर्टरी डिजीज, हार्ट अटैक, हार्ट फेल्योर, हाइपरटेंशन से संबंधित रोग, और वाल्व संबंधी विकारों को शामिल करता है।
Hyper Acidity
हाइपरएसिडिटी (Hyperacidity) को आयुर्वेद में अम्लपित्त कहा जाता है। यह एक आम विकार है जिसमें पेट में अधिक मात्रा में अम्ल (Acid) बनता है, जिससे जलन, खट्टी डकार, उल्टी और पेट में असहजता होती है।